जब रोहितको इस बातका पता चला कि पिताजी तो मेरा बलिदान करना चाहते हैं, तब वह अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये हाथमें धनुष लेकर वनमें चला गया॥ १६॥✎ 16372046
रोहितस्तदभिज्ञाय पितुः कर्म चिकीर्षितम्।
प्राणप्रेप्सुर्धनुष्पाणिररण्यं प्रत्यपद्यत॥ १६
जब रोहितको इस बातका पता चला कि पिताजी तो मेरा बलिदान करना चाहते हैं, तब वह अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये हाथमें धनुष लेकर वनमें चला गया॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.7.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 39) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/7/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)