श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.26

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अथाम्बरीषस्तनयेषु राज्यं

समानशीलेषु विसृज्य धीरः४।

वनं विवेशात्मनि वासुदेवे

मनो दधद् ध्वस्तगुणप्रवाहः॥ २६

athāmbarīṣastanayeṣu rājyaṃ

samānaśīleṣu visṛjya dhīraḥ|

vanaṃ viveśātmani vāsudeve

mano dadhad dhvastaguṇapravāhaḥ|| 26

अर्थ

तदनन्तर राजा अम्बरीषने अपने ही समान भक्त पुत्रोंपर राज्यका भार छोड़ दिया और स्वयं वे वनमें चले गये। वहाँ वे बड़ी धीरताके साथ आत्मस्वरूप भगवान्‌में अपना मन लगाकर गुणोंके प्रवाहरूप संसारसे मुक्त हो गये॥ २६॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    वीरः।

    (मुद्रित पृष्ठ 31)

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