श्रीशुकदेवजी कहते हैं—दुर्वासाजीने बहुत ही सन्तुष्ट होकर राजा अम्बरीषके गुणोंकी प्रशंसा की और उसके बाद उनसे अनुमति लेकर आकाशमार्गसे उस ब्रह्मलोककी यात्रा की जो केवल निष्काम कर्मसे ही प्राप्त होता है॥ २२॥
एवं संकीर्त्य राजानं दुर्वासाः परितोषितः।
ययौ विहायसाऽऽमन्त्र्य ब्रह्मलोकमहैतुकम्॥ २२
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—दुर्वासाजीने बहुत ही सन्तुष्ट होकर राजा अम्बरीषके गुणोंकी प्रशंसा की और उसके बाद उनसे अनुमति लेकर आकाशमार्गसे उस ब्रह्मलोककी यात्रा की जो केवल निष्काम कर्मसे ही प्राप्त होता है॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.5.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 30) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/5/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)