श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.22

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं संकीर्त्य राजानं दुर्वासाः परितोषितः।

ययौ विहायसाऽऽमन्त्र्य ब्रह्मलोकमहैतुकम्॥ २२✎ 2045

evaṃ saṃkīrtya rājānaṃ durvāsāḥ paritoṣitaḥ|

yayau vihāyasā''mantrya brahmalokamahaitukam|| 22

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—दुर्वासाजीने बहुत ही सन्तुष्ट होकर राजा अम्बरीषके गुणोंकी प्रशंसा की और उसके बाद उनसे अनुमति लेकर आकाशमार्गसे उस ब्रह्मलोककी यात्रा की जो केवल निष्काम कर्मसे ही प्राप्त होता है॥ २२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2045 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): मन्त्रॺ ब्र → मन्त्र्य ब्र

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