परीक्षित्! जबसे दुर्वासाजी भागे थे, तबसे अबतक राजा अम्बरीषने भोजन नहीं किया था। वे उनके लौटनेकी बाट देख रहे थे। अब उन्होंने दुर्वासाजीके चरण पकड़ लिये और उन्हें प्रसन्न करके विधिपूर्वक भोजन कराया॥ १८॥
राजा तमकृताहारः प्रत्यागमनकाङ्क्षया।
चरणावुपसंगृह्य प्रसाद्य समभोजयत्॥ १८
परीक्षित्! जबसे दुर्वासाजी भागे थे, तबसे अबतक राजा अम्बरीषने भोजन नहीं किया था। वे उनके लौटनेकी बाट देख रहे थे। अब उन्होंने दुर्वासाजीके चरण पकड़ लिये और उन्हें प्रसन्न करके विधिपूर्वक भोजन कराया॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.5.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 30) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/5/18/