॥ श्रीहरिः ॥
राजन्ननुगृहीतोऽहं१ त्वयातिकरुणात्मना।
मदघं पृष्ठतः कृत्वा प्राणा यन्मेऽभिरक्षिताः॥ १७
rājannanugṛhīto'haṃ tvayātikaruṇātmanā|
madaghaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā prāṇā yanme'bhirakṣitāḥ|| 17
अर्थ
महाराज अम्बरीष! आपका हृदय करुणाभावसे परिपूर्ण है। आपने मेरे ऊपर महान् अनुग्रह किया। अहो, आपने मेरे अपराधको भुलाकर मेरे प्राणोंकी रक्षा की है!॥ १७॥
राजन्ननुगृहीतोऽहं त्वयातिकरुणात्मना।
मदघं पृष्ठतः कृत्वा प्राणा यन्मेऽभिरक्षिताः॥ १७
महाराज अम्बरीष! आपका हृदय करुणाभावसे परिपूर्ण है। आपने मेरे ऊपर महान् अनुग्रह किया। अहो, आपने मेरे अपराधको भुलाकर मेरे प्राणोंकी रक्षा की है!॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.5.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 30) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/5/17/टिप्पणियाँ
- १
तोऽस्मि।
(मुद्रित पृष्ठ 30)