श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.51

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

दिशो नभः क्ष्मां विवरान् समुद्रा-

ल्‍ँलोकान् सपालांस्त्रिदिवं गतः सः।

यतो यतो धावति तत्र तत्र

सुदर्शनं दुष्प्रसहं ददर्श॥ ५१

diśo nabhaḥ kṣmāṃ vivarān samudrā-

lm̐lokān sapālāṃstridivaṃ gataḥ saḥ|

yato yato dhāvati tatra tatra

sudarśanaṃ duṣprasahaṃ dadarśa|| 51

अर्थ

दुर्वासाजी दिशा, आकाश, पृथ्वी, अतल-वितल आदि नीचेके लोक, समुद्र, लोकपाल और उनके द्वारा सुरक्षित लोक एवं स्वर्गतकमें गये; परन्तु जहाँ-जहाँ वे गये, वहीं-वहीं उन्होंने असह्य तेजवाले सुदर्शन चक्रको अपने पीछे लगा देखा॥ ५१॥✎ 1634

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1634 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तेज-वाले → तेजवाले

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