॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.4.45
यो मामतिथिमायातमातिथ्येन निमन्त्र्य च।✎ 2043
अदत्त्वा भुक्तवांस्तस्य सद्यस्ते दर्शये फलम्॥ ४५
yo māmatithimāyātamātithyena nimantrya ca|
adattvā bhuktavāṃstasya sadyaste darśaye phalam|| 45
अर्थ
देखो, मैं इसका अतिथि होकर आया हूँ। इसने अतिथि-सत्कार करनेके लिये मुझे निमन्त्रण भी दिया है, किन्तु फिर भी मुझे खिलाये बिना ही खा लिया है। अच्छा देख, ‘तुझे अभी इसका फल चखाता हूँ’॥ ४५॥