श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.45

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यो मामतिथिमायातमातिथ्येन निमन्त्र्य च।✎ 2043

अदत्त्वा भुक्तवांस्तस्य सद्यस्ते दर्शये फलम्॥ ४५

yo māmatithimāyātamātithyena nimantrya ca|

adattvā bhuktavāṃstasya sadyaste darśaye phalam|| 45

अर्थ

देखो, मैं इसका अतिथि होकर आया हूँ। इसने अतिथि-सत्कार करनेके लिये मुझे निमन्त्रण भी दिया है, किन्तु फिर भी मुझे खिलाये बिना ही खा लिया है। अच्छा देख, ‘तुझे अभी इसका फल चखाता हूँ’॥ ४५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2043 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): मन्त्रॺ च। → मन्त्र्य च।

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