श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.22

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

ईजेऽश्‍वमेधैरधियज्ञमीश्‍वरं

महाविभूत्योपचितांगदक्षिणैः ।

ततैर्वसिष्ठासितगौतमादिभि-१

र्धन्वन्यभिस्रोतमसौ सरस्वतीम्॥ २२

īje'śvamedhairadhiyajñamīśvaraṃ

mahāvibhūtyopacitāṃgadakṣiṇaiḥ |

tatairvasiṣṭhāsitagautamādibhi-

rdhanvanyabhisrotamasau sarasvatīm|| 22

अर्थ

उन्होंने ‘धन्व’ नामके निर्जल देशमें सरस्वती नदीके प्रवाहके सामने वसिष्ठ, असित, गौतम आदि भिन्‍न-भिन्‍न आचार्योंद्वारा महान् ऐश्‍वर्यके कारण सर्वांगपरिपूर्ण तथा बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले अनेकों अश्‍वमेध यज्ञ करके यज्ञाधिपति भगवान्‌की आराधना की थी॥ २२॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    भिः स्वर्धुन्यभिस्रोतवतीं सर०।

    (मुद्रित पृष्ठ 21)

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