द्वे ज्योतिषी अजानन्त्या निर्भिन्ने कण्टकेन वै॥ ७
sukanyā prāha pitaraṃ bhītā kiñcit kṛtaṃ mayā|
dve jyotiṣī ajānantyā nirbhinne kaṇṭakena vai|| 7
अर्थ
तब सुकन्याने अपने पितासे डरते-डरते कहा कि ‘पिताजी! मैंने कुछ अपराध अवश्य किया है। मैंने अनजानमें दो ज्योतियोंको काँटेसे छेद दिया है’॥ ७॥✎ 1631
सुकन्या प्राह पितरं भीता किञ्चित् कृतं मया।
द्वे ज्योतिषी अजानन्त्या निर्भिन्ने कण्टकेन वै॥ ७
तब सुकन्याने अपने पितासे डरते-डरते कहा कि ‘पिताजी! मैंने कुछ अपराध अवश्य किया है। मैंने अनजानमें दो ज्योतियोंको काँटेसे छेद दिया है’॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.3.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 15) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1125 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): किंञ्चित् → किञ्चित्