श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.3.29

नवम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तस्य पुत्रशतं जज्ञे ककुद्मिज्येष्ठमुत्तमम्।

ककुद्मी रेवतीं कन्यां स्वामादाय विभुं गतः॥ २९

tasya putraśataṃ jajñe kakudmijyeṣṭhamuttamam|

kakudmī revatīṃ kanyāṃ svāmādāya vibhuṃ gataḥ|| 29

अर्थ

उनके सौ श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े थे ककुद्मी। ककुद्मी अपनी कन्या रेवतीको लेकर उसके लिये वर पूछनेके उद्देश्यसे ब्रह्माजीके पास गये। उस समय ब्रह्मलोकका रास्ता ऐसे लोगोंके लिये बेरोक-टोक था। ब्रह्मलोकमें गाने-बजानेकी धूम मची हुई थी। बातचीतके लिये अवसर न मिलनेके कारण वे कुछ क्षण वहीं ठहर गये॥ २९-३०॥

यह अर्थ श्लोक 29–30 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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