॥ श्रीहरिः ॥
सोऽन्तःसमुद्रे नगरीं विनिर्माय कुशस्थलीम्।
आस्थितोऽभुङ्क्त विषयानानर्तादीनरिन्दम॥ २८
so'ntaḥsamudre nagarīṃ vinirmāya kuśasthalīm|
āsthito'bhuṅkta viṣayānānartādīnarindama|| 28
अर्थ
महाराज! रेवतने समुद्रके भीतर कुशस्थली नामकी एक नगरी बसायी थी। उसीमें रहकर वे आनर्त आदि देशोंका राज्य करते थे॥ २८॥
सोऽन्तःसमुद्रे नगरीं विनिर्माय कुशस्थलीम्।
आस्थितोऽभुङ्क्त विषयानानर्तादीनरिन्दम॥ २८
महाराज! रेवतने समुद्रके भीतर कुशस्थली नामकी एक नगरी बसायी थी। उसीमें रहकर वे आनर्त आदि देशोंका राज्य करते थे॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.3.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 17) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/28/