श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.24.62

नवम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

यस्मिन् सत्कर्णपीयूषे यशस्तीर्थवरे सकृत्।

श्रोत्राञ्जलिरुपस्पृश्य धुनुते कर्मवासनाम्॥ ६२

yasmin satkarṇapīyūṣe yaśastīrthavare sakṛt|

śrotrāñjalirupaspṛśya dhunute karmavāsanām|| 62

अर्थ

उनका यश क्या है, लोगोंको पवित्र करनेवाला श्रेष्ठ तीर्थ है। संतोंके कानोंके लिये तो वह साक्षात् अमृत ही है। एक बार भी यदि कानकी अंजलियोंसे उसका आचमन कर लिया जाता है, तो कर्मकी वासनाएँ निर्मूल हो जाती हैं॥ ६२॥

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