श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.24.16

नवम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

आसंगः सारमेयश्‍च मृदुरो मृदुविद् गिरिः।

धर्मवृद्धः सुकर्मा च क्षेत्रोपेक्षोऽरिमर्दनः॥ १६

āsaṃgaḥ sārameyaśca mṛduro mṛduvid giriḥ|

dharmavṛddhaḥ sukarmā ca kṣetropekṣo'rimardanaḥ|| 16

अर्थ

इसी सत्यकके पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकिके नामसे प्रसिद्ध हुए। सात्यकिका जय, जयका कुणि और कुणिका पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्रके तीसरे पुत्रका नाम वृष्णि था। वृष्णिके दो पुत्र हुए—श्‍वफल्क और चित्ररथ। श्‍वफल्ककी पत्‍नीका नाम था गान्दिनी। उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूरके अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्‍न हुए—आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूरके दो पुत्र थे—देववान् और उपदेव। श्‍वफल्कके भाई चित्ररथके पृथु, विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए—जो वृष्णिवंशियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं॥ १४-१८॥✎ 1650

यह अर्थ श्लोक 14–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1650 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वृष्णि-वंशियोंमें → वृष्णिवंशियोंमें

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