श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.23.26

नवम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

पंचाशीतिसहस्राणि ह्यव्याहतबलः समाः।

अनष्टवित्तस्मरणो बुभुजेऽक्षय्यषड्वसु॥ २६

paṃcāśītisahasrāṇi hyavyāhatabalaḥ samāḥ|

anaṣṭavittasmaraṇo bubhuje'kṣayyaṣaḍvasu|| 26

अर्थ

सहस्रबाहु अर्जुन पचासी हजार वर्षतक छहों इन्द्रियोंसे अक्षय विषयोंका भोग करता रहा। इस बीचमें न तो उसके शरीरका बल ही क्षीण हुआ और न तो कभी उसने यही स्मरण किया कि मेरे धनका नाश हो जायगा। उसके धनके नाशकी तो बात ही क्या है, उसका ऐसा प्रभाव था कि उसके स्मरणसे दूसरोंका खोया हुआ धन भी मिल जाता था॥ २६॥

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