श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.21.7

नवम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अथान्यो भोक्ष्यमाणस्य विभक्तस्य महीपते।

विभक्तं व्यभजत् तस्मै वृषलाय हरिं स्मरन्॥ ७

athānyo bhokṣyamāṇasya vibhaktasya mahīpate|

vibhaktaṃ vyabhajat tasmai vṛṣalāya hariṃ smaran|| 7

अर्थ

परीक्षित्! अब बचे हुए अन्‍नको रन्तिदेवने आपसमें बाँट लिया और भोजन करना चाहा। उसी समय एक दूसरा शूद्र-अतिथि आ गया। रन्तिदेवने भगवान्‌का स्मरण करते हुए उस बचे हुए अन्‍नमेंसे भी कुछ भाग शूद्रके रूपमें आये अतिथिको खिला दिया॥ ७॥

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