hariṃ sarvatra saṃpaśyan sa bhuktvā prayayau dvijaḥ|| 6
अर्थ
रन्तिदेव सबमें श्रीभगवान्के ही दर्शन करते थे। अतएव उन्होंने बड़ी श्रद्धासे आदरपूर्वक उसी अन्नमेंसे ब्राह्मणको भोजन कराया। ब्राह्मणदेवता भोजन करके चले गये॥ ६॥
तस्मै संव्यभजत् सोऽन्नमादृत्य श्रद्धयान्वितः।
हरिं सर्वत्र संपश्यन् स भुक्त्वा प्रययौ द्विजः॥ ६
रन्तिदेव सबमें श्रीभगवान्के ही दर्शन करते थे। अतएव उन्होंने बड़ी श्रद्धासे आदरपूर्वक उसी अन्नमेंसे ब्राह्मणको भोजन कराया। ब्राह्मणदेवता भोजन करके चले गये॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.21.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 100) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/21/6/