श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.21.16

नवम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

स वै तेभ्यो नमस्कृत्य निःसंगो विगतस्पृहः।

वासुदेवे भगवति भक्त्या चक्रे मनः परम्॥ १६

sa vai tebhyo namaskṛtya niḥsaṃgo vigataspṛhaḥ|

vāsudeve bhagavati bhaktyā cakre manaḥ param|| 16

अर्थ

रन्तिदेवने उनके चरणोंमें नमस्कार किया। उन्हें कुछ लेना तो था नहीं। भगवान्‌की कृपासे वे आसक्ति और स्पृहासे भी रहित हो गये तथा परम प्रेममय भक्तिभावसे अपने मनको भगवान् वासुदेवमें तन्मय कर दिया। कुछ भी माँगा नहीं॥ १६॥✎ 881

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #881 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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