श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.20.4

नवम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

ऋतेयुस्तस्य कुक्षेयुः स्थण्डिलेयुः कृतेयुकः।

जलेयुः सन्ततेयुश्‍च धर्मसत्यव्रतेयवः॥ ४

ṛteyustasya kukṣeyuḥ sthaṇḍileyuḥ kṛteyukaḥ|

jaleyuḥ santateyuśca dharmasatyavrateyavaḥ|| 4

अर्थ

परीक्षित्! जैसे विश्‍वात्मा प्रधान प्राणसे दस इन्द्रियाँ होती हैं, वैसे ही घृताची अप्सराके गर्भसे रौद्राश्‍वके दस पुत्र हुए—ऋतेयु, कुक्षेयु, स्थण्डिलेयु, कृतेयु, जलेयु, सन्ततेयु, धर्मेयु, सत्येयु, व्रतेयु और सबसे छोटा वनेयु॥ ४-५॥

यह अर्थ श्लोक 4–5 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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