श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.20.2

नवम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

जनमेजयो ह्यभूत् पूरोः प्रचिन्वांस्तत्सुतस्ततः।

प्रवीरोऽथ नमस्युर्वै तस्माच्चारुपदोऽभवत्॥ २

janamejayo hyabhūt pūroḥ pracinvāṃstatsutastataḥ|

pravīro'tha namasyurvai tasmāccārupado'bhavat|| 2

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब मैं राजा पूरुके वंशका वर्णन करूँगा। इसी वंशमें तुम्हारा जन्म हुआ है। इसी वंशके वंशधर बहुत-से राजर्षि और ब्रह्मर्षि भी हुए हैं॥ १॥ पूरुका पुत्र हुआ जनमेजय। जनमेजयका प्रचिन्वान्, प्रचि-न्वान्का प्रवीर, प्रवीरका नमस्यु और नमस्युका पुत्र हुआ चारुपद॥ २॥ चारुपदसे सुद्यु, सुद्युसे बहुगव, बहुगवसे संयाति, संयातिसे अहंयाति और अहंयातिसे रौद्राश्‍व हुआ॥ ३॥

यह व्याख्या श्लोक 9.20.1 से 9.20.3 तककी एक साथ है।

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