श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.20.15

नवम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

दुष्यन्त उवाच

उपपन्‍नमिदं सुभ्रु जातायाः कुशिकान्वये।

स्वयं हि वृणते राज्ञां कन्यकाः सदृशं वरम्॥ १५

upapannamidaṃ subhru jātāyāḥ kuśikānvaye|

svayaṃ hi vṛṇate rājñāṃ kanyakāḥ sadṛśaṃ varam|| 15

अर्थ

दुष्यन्तने कहा—‘सुन्दरी! तुम कुशिकवंशमें उत्पन्‍न हुई हो, इसलिये इस प्रकारका आतिथ्यसत्कार तुम्हारे योग्य ही है। क्योंकि राजकन्याएँ स्वयं ही अपने योग्य पतिको वरण कर लिया करती हैं’॥ १५॥

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