कमलनयन! आप यहाँ बैठिये और हम जो कुछ आपका स्वागत-सत्कार करें, उसे स्वीकार कीजिये। आश्रममें कुछ नीवार (तिन्नीका भात) है। आपकी इच्छा हो तो भोजन कीजिये और जँचे तो यहीं ठहरिये’॥ १४॥
आस्यतां ह्यरविन्दाक्ष गृह्यतामर्हणं च नः।
भुज्यतां सन्ति नीवारा उष्यतां यदि रोचते॥ १४
कमलनयन! आप यहाँ बैठिये और हम जो कुछ आपका स्वागत-सत्कार करें, उसे स्वीकार कीजिये। आश्रममें कुछ नीवार (तिन्नीका भात) है। आपकी इच्छा हो तो भोजन कीजिये और जँचे तो यहीं ठहरिये’॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.20.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 96) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/20/14/