श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.20.11

नवम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

का त्वं कमलपत्राक्षि कस्यासि हृदयंगमे।

किं वा चिकीर्षितं त्वत्र भवत्या निर्जने वने॥ ११

kā tvaṃ kamalapatrākṣi kasyāsi hṛdayaṃgame|

kiṃ vā cikīrṣitaṃ tvatra bhavatyā nirjane vane|| 11

अर्थ

‘कमलदलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली देवि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो? मेरे हृदयको अपनी ओर आकर्षित करनेवाली सुन्दरी! तुम इस निर्जन वनमें रहकर क्या करना चाहती हो?॥ ११॥✎ 1646

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1646 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जग-मगा → जगमगा

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