श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.19.5

नवम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

सोत्तीर्य कूपात् सुश्रोणी तमेव चकमे किल।

तया वृतं समुद्वीक्ष्य बह्व्योऽजाः कान्तकामिनीः॥ ५✎ 2054

sottīrya kūpāt suśroṇī tameva cakame kila|

tayā vṛtaṃ samudvīkṣya bahvyo'jāḥ kāntakāminīḥ|| 5

अर्थ

जब वह सुन्दरी बकरी कूएँसे निकली तो उसने उस बकरेसे ही प्रेम करना चाहा। वह दाढ़ी-मूँछमण्डित बकरा हृष्ट-पुष्ट, जवान, बकरियोंको सुख देनेवाला, विहारकुशल और बहुत प्यारा था। जब दूसरी बकरियोंने देखा कि कूएँमें गिरी हुई बकरीने उसे अपना प्रेमपात्र चुन लिया है, तब उन्होंने भी उसीको अपना पति बना लिया। वे तो पहलेसे ही पतिकी तलाशमें थीं। उस बकरेके सिरपर कामरूप पिशाच सवार था। वह अकेला ही बहुत-सी बकरियोंके साथ विहार करने लगा और अपनी सब सुध-बुध खो बैठा॥ ५-६॥✎ 1644

यह अर्थ श्लोक 5–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1644 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ग्राम-वासी → ग्रामवासी
  • #2054 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): क्ष्य बह्वॺोऽजा → क्ष्य बह्व्योऽजा

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