श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.19.28

नवम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

सर्वत्र संगमुत्सृज्य स्वप्नौपम्येन भार्गवी।

कृष्णे मनः समावेश्य व्यधुनोल्लिंगमात्मनः॥ २८

sarvatra saṃgamutsṛjya svapnaupamyena bhārgavī|

kṛṣṇe manaḥ samāveśya vyadhunolliṃgamātmanaḥ|| 28

अर्थ

स्वजन-सम्बन्धियोंका—जो ईश्‍वरके अधीन है—एक स्थानपर इकट्ठा हो जाना वैसा ही है, जैसा प्याऊपर पथिकोंका। यह सब भगवान्‌की मायाका खेल और स्वप्नके सरीखा ही है। ऐसा समझकर देवयानीने सब पदार्थोंकी आसक्ति त्याग दी और अपने मनको भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय करके बन्धनके हेतु लिंगशरीरका परित्याग कर दिया—वह भगवान्‌को प्राप्त हो गयी॥ २७-२८॥

यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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