श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.19.20

नवम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

दृष्टं श्रुतमसद्२ बुद‍्ध्वा नानुध्यायेन्‍न संविशेत्।

संसृतिं चात्मनाशं च तत्र विद्वान् स आत्मदृक्॥ २०

dṛṣṭaṃ śrutamasad buddhvā nānudhyāyenna saṃviśet|

saṃsṛtiṃ cātmanāśaṃ ca tatra vidvān sa ātmadṛk|| 20

अर्थ

लोक-परलोक दोनोंके ही भोग असत् हैं, ऐसा समझकर न तो उनका चिन्तन करना चाहिये और न भोग ही। समझना चाहिये कि उनके चिन्तनसे ही जन्म-मृत्युरूप संसारकी प्राप्ति होती है और उनके भोगसे तो आत्मनाश ही हो जाता है। वास्तवमें इनके रहस्यको जानकर इनसे अलग रहनेवाला ही आत्मज्ञानी है’॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    सद्विद्वान्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 94)

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