विषयोंका बार-बार सेवन करते-करते मेरे एक हजार वर्ष पूरे हो गये, फिर भी क्षण-प्रति-क्षण उन भोगोंकी लालसा बढ़ती ही जा रही है॥ १८॥
पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयान् सेवतोऽसकृत्।
तथापि चानुसवनं तृष्णा तेषूपजायते॥ १८
विषयोंका बार-बार सेवन करते-करते मेरे एक हजार वर्ष पूरे हो गये, फिर भी क्षण-प्रति-क्षण उन भोगोंकी लालसा बढ़ती ही जा रही है॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.19.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 94) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/19/18/