और तो क्या—अपनी मा, बहिन और कन्याके साथ भी अकेले एक आसनपर सटकर नहीं बैठना चाहिये। इन्द्रियाँ इतनी बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानोंको भी विचलित कर देती हैं॥ १७॥✎ 1645
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत्।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥ १७
और तो क्या—अपनी मा, बहिन और कन्याके साथ भी अकेले एक आसनपर सटकर नहीं बैठना चाहिये। इन्द्रियाँ इतनी बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानोंको भी विचलित कर देती हैं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.19.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 93) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/19/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)