श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.19.17

नवम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत्।

बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥ १७

mātrā svasrā duhitrā vā nāviviktāsano bhavet|

balavānindriyagrāmo vidvāṃsamapi karṣati|| 17

अर्थ

और तो क्या—अपनी मा, बहिन और कन्याके साथ भी अकेले एक आसनपर सटकर नहीं बैठना चाहिये। इन्द्रियाँ इतनी बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानोंको भी विचलित कर देती हैं॥ १७॥✎ 1645

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1645 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (भोग-वासना) → (भोगवासना)

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