जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तुके साथ राग-द्वेषका भाव नहीं रखता तब वह समदर्शी हो जाता है, तथा उसके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी बन जाती हैं॥ १५॥✎ 1645
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम्।
समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः॥ १५
जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तुके साथ राग-द्वेषका भाव नहीं रखता तब वह समदर्शी हो जाता है, तथा उसके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी बन जाती हैं॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.19.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 93) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/19/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)