श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.19.15

नवम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम्।

समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः॥ १५

yadā na kurute bhāvaṃ sarvabhūteṣvamaṃgalam|

samadṛṣṭestadā puṃsaḥ sarvāḥ sukhamayā diśaḥ|| 15

अर्थ

जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तुके साथ राग-द्वेषका भाव नहीं रखता तब वह समदर्शी हो जाता है, तथा उसके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी बन जाती हैं॥ १५॥✎ 1645

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1645 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (भोग-वासना) → (भोगवासना)

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