विषयोंके भोगनेसे भोगवासना कभी शान्त नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घीकी आहुति डालनेपर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोगवासनाएँ भी भोगोंसे प्रबल हो जाती हैं॥ १४॥✎ 1645
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ १४
विषयोंके भोगनेसे भोगवासना कभी शान्त नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घीकी आहुति डालनेपर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोगवासनाएँ भी भोगोंसे प्रबल हो जाती हैं॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.19.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 93) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)