श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.31

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

विलोक्यौशनसीं राजञ्छर्मिष्ठा सप्रजां क्‍वचित्।

तमेव वव्रे रहसि सख्याः पतिमृतौ सती॥ ३१

vilokyauśanasīṃ rājañcharmiṣṭhā saprajāṃ kvacit|

tameva vavre rahasi sakhyāḥ patimṛtau satī|| 31

अर्थ

परीक्षित्! कुछ ही दिनों बाद देवयानी पुत्रवती हो गयी। उसको पुत्रवती देखकर एक दिन शर्मिष्ठाने भी अपने ऋतुकालमें देवयानीके पति ययातिसे एकान्तमें सहवासकी याचना की॥ ३१॥

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