svānāṃ tat saṃkaṭaṃ vīkṣya tadarthasya ca gauravam|
devayānīṃ paryacarat strīsahasreṇa dāsavat|| 29
अर्थ
शर्मिष्ठाने अपने परिवारवालोंका संकट और उनके कार्यका गौरव देखकर देवयानीकी बात स्वीकार कर ली। वह अपनी एक हजार सहेलियोंके साथ दासीके समान उसकी सेवा करने लगी॥ २९॥
स्वानां तत् संकटं वीक्ष्य तदर्थस्य च गौरवम्।
देवयानीं पर्यचरत् स्त्रीसहस्रेण दासवत्॥ २९
शर्मिष्ठाने अपने परिवारवालोंका संकट और उनके कार्यका गौरव देखकर देवयानीकी बात स्वीकार कर ली। वह अपनी एक हजार सहेलियोंके साथ दासीके समान उसकी सेवा करने लगी॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.18.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 89) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/18/29/