॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.18.20
तं वीरमाहौशनसी प्रेमनिर्भरया गिरा।
राजंस्त्वया गृहीतो मे पाणिः परपुरंजय॥ २०
taṃ vīramāhauśanasī premanirbharayā girā|
rājaṃstvayā gṛhīto me pāṇiḥ parapuraṃjaya|| 20
अर्थ
देवयानीने प्रेमभरी वाणीसे वीर ययातिसे कहा—‘वीरशिरोमणे राजन्! आज आपने मेरा हाथ पकड़ा है। अब जब आपने मेरा हाथ पकड़ लिया, तब कोई दूसरा इसे न पकड़े। वीरश्रेष्ठ! कूएँमें गिर जानेपर मुझे जो आपका अचानक दर्शन हुआ है, यह भगवान्का ही किया हुआ सम्बन्ध समझना चाहिये। इसमें हमलोगोंकी या और किसी मनुष्यकी कोई चेष्टा नहीं है॥ २०-२१॥