॥ श्रीहरिः ॥
शर्मिष्ठाजानती वासो गुरुपुत्र्याः समव्ययत्।
स्वीयं मत्वा प्रकुपिता देवयानीदमब्रवीत्॥ १०
śarmiṣṭhājānatī vāso guruputryāḥ samavyayat|
svīyaṃ matvā prakupitā devayānīdamabravīt|| 10
अर्थ
शीघ्रताके कारण शर्मिष्ठाने अनजानमें देवयानीके वस्त्रको अपना समझकर पहन लिया। इसपर देवयानी क्रोधके मारे आग-बबूला हो गयी। उसने कहा—॥ १०॥
शर्मिष्ठाजानती वासो गुरुपुत्र्याः समव्ययत्।
स्वीयं मत्वा प्रकुपिता देवयानीदमब्रवीत्॥ १०
शीघ्रताके कारण शर्मिष्ठाने अनजानमें देवयानीके वस्त्रको अपना समझकर पहन लिया। इसपर देवयानी क्रोधके मारे आग-बबूला हो गयी। उसने कहा—॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.18.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 87) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/18/10/