श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.14.34

नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अहो जाये तिष्ठ तिष्ठ घोरे न त्यक्तुमर्हसि।

मां त्वमद्याप्यनिर्वृत्य वचांसि कृणवावहै॥ ३४

aho jāye tiṣṭha tiṣṭha ghore na tyaktumarhasi|

māṃ tvamadyāpyanirvṛtya vacāṃsi kṛṇavāvahai|| 34

अर्थ

‘प्रिये! तनिक ठहर जाओ। एक बार मेरी बात मान लो। निष्ठुरे! अब आज तो मुझे सुखी किये बिना मत जाओ। क्षणभर ठहरो; आओ हम दोनों कुछ बातें तो कर लें॥ ३४॥✎ 2051

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