परीक्षित्! राजा पुरूरवाने जब अपने शयना-गारमें अपनी प्रियतमा उर्वशीको नहीं देखा तो वे अनमने हो गये। उनका चित्त उर्वशीमें ही बसा हुआ था। वे उसके लिये शोकसे विह्वल हो गये और उन्मत्तकी भाँति पृथ्वीमें इधर-उधर भटकने लगे॥ ३२॥✎ 2051
ऐलोऽपि शयने जायामपश्यन् विमना इव।
तच्चित्तो विह्वलः शोचन् बभ्रामोन्मत्तवन्महीम्॥ ३२
परीक्षित्! राजा पुरूरवाने जब अपने शयना-गारमें अपनी प्रियतमा उर्वशीको नहीं देखा तो वे अनमने हो गये। उनका चित्त उर्वशीमें ही बसा हुआ था। वे उसके लिये शोकसे विह्वल हो गये और उन्मत्तकी भाँति पृथ्वीमें इधर-उधर भटकने लगे॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.14.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 73) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/14/32/