श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.55

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

एकपत्‍नीव्रतधरो राजर्षिचरितः शुचिः।

स्वधर्मं गृहमेधीयं शिक्षयन् स्वयमाचरत्॥ ५५

ekapatnīvratadharo rājarṣicaritaḥ śuciḥ|

svadharmaṃ gṛhamedhīyaṃ śikṣayan svayamācarat|| 55

अर्थ

भगवान् श्रीरामने एकपत्‍नीका व्रत धारण कर रखा था, उनके चरित्र अत्यन्त पवित्र एवं राजर्षियोंके-से थे। वे गृहस्थोचित स्वधर्मकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं उस धर्मका आचरण करते थे॥ ५५॥✎ 1640

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1640 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सती-शिरोमणि → सतीशिरोमणि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें