॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.10.17
सा वानरेन्द्रबलरुद्धविहारकोष्ठ-१
श्रीद्वारगोपुरसदोवलभीविटंका ।
निर्भज्यमानधिषणध्वजहेमकुम्भ-
शृंगाटका गजकुलैर्ह्रदिनीव घूर्णा॥ १७✎ 1132
sā vānarendrabalaruddhavihārakoṣṭha-
śrīdvāragopurasadovalabhīviṭaṃkā |
nirbhajyamānadhiṣaṇadhvajahemakumbha-
śṛṃgāṭakā gajakulairhradinīva ghūrṇā|| 17
अर्थ
उस समय वानरराजकी सेनाने लंकाके सैर करने और खेलनेके स्थान, अन्नके गोदाम, खजाने, दरवाजे, फाटक, सभाभवन, छज्जे और पक्षियोंके रहनेके स्थानतकको घेर लिया। उन्होंने वहाँकी वेदी, ध्वजाएँ, सोनेके कलश और चौराहे तोड़-फोड़ डाले। उस समय लंका ऐसी मालूम पड़ रही थी, जैसे झुंड-के-झुंड हाथियोंने किसी नदीको मथ डाला हो॥ १७॥
टिप्पणियाँ
- १
कोष०।