श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.7.19

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तदुग्रवेगं दिशि दिश्युपर्यधो

विसर्पदुत्सर्पदसह्यमप्रति ।

भीताः प्रजा दुद्रुवुरङ्ग सेश्‍वरा

अरक्ष्यमाणाः शरणं सदाशिवम्॥ १९

tadugravegaṃ diśi diśyuparyadho

visarpadutsarpadasahyamaprati |

bhītāḥ prajā dudruvuraṅga seśvarā

arakṣyamāṇāḥ śaraṇaṃ sadāśivam|| 19

अर्थ

वह अत्यन्त उग्र विष दिशा-विदिशामें, ऊपर-नीचे सर्वत्र उड़ने और फैलने लगा। इस असह्य विषसे बचनेका कोई उपाय भी तो न था। भयभीत होकर सम्पूर्ण प्रजा और प्रजापति किसीके द्वारा त्राण न मिलनेपर भगवान् सदाशिवकी शरणमें गये॥ १९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें