देवताओंको बिना अस्त्र-शस्त्रके सामने आते देख दैत्यसेनापतियोंके मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उन्होंने देवताओंको पकड़ लेना चाहा। परन्तु दैत्यराज बलि सन्धि और विरोधके अवसरको जाननेवाले एवं पवित्र कीर्तिसे सम्पन्न थे। उन्होंने दैत्योंको वैसा करनेसे रोक दिया॥ २८॥✎ 694
दृष्ट्वारीनप्यसंयत्तान् जातक्षोभान्स्वनायकान्।
न्यषेधद् दैत्यराट् श्लोक्यः सन्धिविग्रहकालवित्॥ २८
देवताओंको बिना अस्त्र-शस्त्रके सामने आते देख दैत्यसेनापतियोंके मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उन्होंने देवताओंको पकड़ लेना चाहा। परन्तु दैत्यराज बलि सन्धि और विरोधके अवसरको जाननेवाले एवं पवित्र कीर्तिसे सम्पन्न थे। उन्होंने दैत्योंको वैसा करनेसे रोक दिया॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.6.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 933) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/6/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)