श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.22

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

क्षिप्त्वा क्षीरोदधौ सर्वा वीरुत्तृणल२तौषधीः।

मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा तु३ वासुकिम्॥ २२

kṣiptvā kṣīrodadhau sarvā vīruttṛṇalatauṣadhīḥ|

manthānaṃ mandaraṃ kṛtvā netraṃ kṛtvā tu vāsukim|| 22

अर्थ

पहले क्षीरसागरमें सब प्रकारके घास, तिनके, लताएँ और ओषधियाँ डाल दो। फिर तुमलोग मन्दराचलकी मथानी और वासुकि नागकी नेती बनाकर मेरी सहायतासे समुद्रका मन्थन करो। अब आलस्य और प्रमादका समय नहीं है। देवताओ! विश्वास रखो—दैत्योंको तो मिलेगा केवल श्रम और क्लेश, परन्तु फल मिलेगा तुम्हीं लोगोंको॥ २२-२३॥✎ 692

यह अर्थ श्लोक 22–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—जलौषधीः।

    (मुद्रित पृष्ठ 932)
  2. ३

    प्रा० पा०—च।

    (मुद्रित पृष्ठ 932)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #692 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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