yasya pītasya vai janturmṛtyugrasto'maro bhavet|| 21
अर्थ
तुमलोग बिना विलम्बके अमृत निकालनेका प्रयत्न करो। उसे पी लेनेपर मरनेवाला प्राणी भी अमर हो जाता है॥ २१॥✎ 692
अमृतोत्पादने यत्नः क्रियतामविलम्बितम्।
यस्य पीतस्य वै जन्तुर्मृत्युग्रस्तोऽमरो भवेत्॥ २१
तुमलोग बिना विलम्बके अमृत निकालनेका प्रयत्न करो। उसे पी लेनेपर मरनेवाला प्राणी भी अमर हो जाता है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.6.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 932) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/6/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#692 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने