देवताओं और दैत्योंका मिलकर समुद्रमन्थनके लिये उद्योग करना
श्रीशुक उवाच
एवं स्तुतः सुरगणैर्भगवान् हरिरीश्वरः।
तेषामाविरभूद् राजन्सहस्रार्कोदयद्युतिः॥ १
evaṃ stutaḥ suragaṇairbhagavān harirīśvaraḥ|
teṣāmāvirabhūd rājansahasrārkodayadyutiḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे उनके बीचमें ही प्रकट हो गये। उनके शरीरकी प्रभा ऐसी थी, मानो हजारों सूर्य एक साथ ही उग गये हों॥ १॥✎ 6896902031
एवं स्तुतः सुरगणैर्भगवान् हरिरीश्वरः।
तेषामाविरभूद् राजन्सहस्रार्कोदयद्युतिः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे उनके बीचमें ही प्रकट हो गये। उनके शरीरकी प्रभा ऐसी थी, मानो हजारों सूर्य एक साथ ही उग गये हों॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.6.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 929) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/6/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)