श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.49

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यथा हि स्कन्धशाखानां तरोर्मूलावसेचनम्।

एवमाराधनं विष्णोः सर्वेषामात्मनश्‍च हि॥ ४९

yathā hi skandhaśākhānāṃ tarormūlāvasecanam|

evamārādhanaṃ viṣṇoḥ sarveṣāmātmanaśca hi|| 49

अर्थ

जैसे वृक्षकी जड़को पानीसे सींचना उसकी बड़ी-बड़ी शाखाओं और छोटी-छोटी डालियोंको भी सींचना है, वैसे ही सर्वात्मा भगवान्‌की आराधना सम्पूर्ण प्राणियोंकी और अपनी भी आराधना है॥ ४९॥✎ 687 688

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #687 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #688 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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