श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.48

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नावमः कर्मकल्पोऽपि विफलायेश्‍वरार्पितः।

कल्पते पुरुषस्यैष स ह्यात्मा दयितो हितः१॥ ४८

nāvamaḥ karmakalpo'pi viphalāyeśvarārpitaḥ|

kalpate puruṣasyaiṣa sa hyātmā dayito hitaḥ|| 48

अर्थ

भगवान्‌को समर्पित किया हुआ छोटे-से-छोटा कर्माभास भी कभी विफल नहीं होता। क्योंकि भगवान् जीवके परम हितैषी, परम प्रियतम और आत्मा ही हैं॥ ४८॥✎ 687 688

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—विभुः।

    (मुद्रित पृष्ठ 929)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #687 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #688 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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