श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.23

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अयं च तस्य स्थितिपालनक्षणः

सत्त्वं जुषाणस्य भवाय देहिनाम्।

तस्माद् व्रजामः शरणं जगद‍्गुरुं

स्वानां स नो धास्यति शं सुरप्रियः॥ २३

ayaṃ ca tasya sthitipālanakṣaṇaḥ

sattvaṃ juṣāṇasya bhavāya dehinām|

tasmād vrajāmaḥ śaraṇaṃ jagadguruṃ

svānāṃ sa no dhāsyati śaṃ surapriyaḥ|| 23

अर्थ

उन्होंने इस समय प्राणियोंके कल्याणके लिये सत्त्वगुणको स्वीकार कर रखा है। इसलिये यह जगत‍्की स्थिति और रक्षाका अवसर है। अतः हम सब उन्हीं जगद‍्गुरु परमात्माकी शरण ग्रहण करते हैं। वे देवताओंके प्रिय हैं और देवता उनके प्रिय। इसलिये हम निजजनोंका वे अवश्य ही कल्याण करेंगे॥ २३॥

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