॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.5.22
न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो
नोपेक्षणीयादरणीयपक्षः ।
अथापि सर्गस्थितिसंयमार्थं
धत्ते रजःसत्त्वतमांसि काले॥ २२
na yasya vadhyo na ca rakṣaṇīyo
nopekṣaṇīyādaraṇīyapakṣaḥ |
athāpi sargasthitisaṃyamārthaṃ
dhatte rajaḥsattvatamāṃsi kāle|| 22
अर्थ
यद्यपि उनकी दृष्टिमें न कोई वधका पात्र है और न रक्षाका, उनके लिये न तो कोई उपेक्षणीय है न कोई आदरका पात्र ही—फिर भी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके लिये समय-समयपर वे रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणको स्वीकार किया करते हैं॥ २२॥