श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.4

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं

क्‍वचिद् विभातं क्‍व च तत् तिरोहितम्।

अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते

स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः॥ ४

yaḥ svātmanīdaṃ nijamāyayārpitaṃ

kvacid vibhātaṃ kva ca tat tirohitam|

aviddhadṛk sākṣyubhayaṃ tadīkṣate

sa ātmamūlo'vatu māṃ parātparaḥ|| 4

अर्थ

यह विश्‍वप्रपंच उन्हींकी मायासे उनमें अध्यस्त है। यह कभी प्रतीत होता है, तो कभी नहीं। परन्तु उनकी दृष्टि ज्यों-की-त्यों—एक-सी रहती है। वे इसके साक्षी हैं और उन दोनोंको ही देखते रहते हैं। वे सबके मूल हैं और अपने मूल भी वही हैं। कोई दूसरा उनका कारण नहीं है। वे ही समस्त कार्य और कारणोंसे अतीत प्रभु मेरी रक्षा करें॥ ४॥✎ 661 662

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #661 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #662 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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