श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.30

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं

ब्रह्मादयो विविधलिङ्गभिदाभिमानाः।

नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात्

तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत्॥ ३०

evaṃ gajendramupavarṇitanirviśeṣaṃ

brahmādayo vividhaliṅgabhidābhimānāḥ|

naite yadopasasṛpurnikhilātmakatvāt

tatrākhilāmaramayo harirāvirāsīt|| 30

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! गजेन्द्रने बिना किसी भेदभावके निर्विशेषरूपसे भगवान्‌की स्तुति की थी, इसलिये भिन्‍न-भिन्‍न नाम और रूपको अपना स्वरूप माननेवाले ब्रह्मा आदि देवता उसकी रक्षा करनेके लिये नहीं आये। उस समय सर्वात्मा होनेके कारण सर्वदेवस्वरूप स्वयं भगवान् श्रीहरि प्रकट हो गये॥ ३०॥✎ 666

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #666 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें