श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.29

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्‍त्याहंधिया हतम्।

तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगव१न्तमितोऽस्म्यहम्॥ २९✎ 2223

nāyaṃ veda svamātmānaṃ yacchaktyāhaṃdhiyā hatam|

taṃ duratyayamāhātmyaṃ bhagavantamito'smyaham|| 29

अर्थ

आपकी माया अहंबुद्धिसे आत्माका स्वरूप ढक गया है, इसीसे यह जीव अपने स्वरूपको नहीं जान पाता। आपकी महिमा अपार है। उन सर्वशक्तिमान् एवं माधुर्यनिधि भगवान्‌की मैं शरणमें हूँ॥ २९॥✎ 665

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—वन्तं नतोऽस्म्यहम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 918)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #665 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #2223 टिप्पणी: → प्रा० पा०—वन्तं नतोऽस्म्यहम्।

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