श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.27

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते।

योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम्॥ २७

yogarandhitakarmāṇo hṛdi yogavibhāvite|

yogino yaṃ prapaśyanti yogeśaṃ taṃ nato'smyaham|| 27

अर्थ

योगीलोग योगके द्वारा कर्म, कर्मवासना और कर्मफलको भस्म करके अपने योगशुद्ध हृदयमें जिन योगेश्‍वरभगवान्‌का साक्षात्कार करते हैं—उन प्रभुको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २७॥

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